मोदी साहब इंडिया मौन था अब "साइलेंट या वायलेंट "
करोना के कारण किसको किसपर कितनी करुणा आई वर्तमान में सब जग जाहिर है। माहिरों के अभी भी अपने- अपने कयास हैं कि आने वाले वक्त में भी सम्पूर्ण लॉकडाउन की स्थिति पैदा हो सकती है। आए दिन कोई - न -कोई ऐसी भ्रान्ति भरी खबर भी सोशल मीडिया पर घूमती है। लेकिन कोविड-19 के लिए आई दवाई कितनी असरदार होगी यह अब सेवन करने के बाद ही पता चलेगा तब तक सभी को सयम बनाकर ही घर में रहना होगा। वैसे भारत में करोना के बीच कई तरह के किस्से निकल कर सामने आए। हाँ -जिक्र योग्य है कि इस महामारी में हर इंसान की एक अलग ही कहानी है।
जितने मुँह उतनी बातें - इस कहावत को लिखा जाना कोई दोराय वाला वाक्य नहीं , क्यूंकि महामारी के मझदार में ऐसी कई बातें निकल कर सामने आई जो अप्रैल -मई माह कई लोगों की मानसिक स्थिति बिगाड़ कर चली गई। बात शुरू हुई थी कि किराएदार से मालिक किराया न ले लेकिन भारत के कई फीसदी शहरों में ऐसे किस्से सामने आए जहाँ मकानमालिक के लिए अपनी आमदनी से मतलब था चाहे किराएदार के लिए 2 वक्त के खाने के लिए सोचना भी मुश्किल हो गया था. लेकिन ऐसी घटनाएं इस गुजरे वक्त में सिमटी ही रह गई क्यूंकि अधिकांश ख़बरें प्रवासी मजदूरों के इर्द-गिर्द थी। लेकिन अगर किसी मजदूर ने अपनी कोई मज़बूरी नहीं बताई सिर्फ यही ब्यान किया की घर जाना और खाना - खाना है. सवाल भी कुछ ऐसे ही थे कि यहाँ कोई समस्या तो नहीं आ रही ? कितने दिनों से पैदल चल रहे हो ? कहाँ जाना है ? बस यही था क्यूंकि बस की सुविधा नहीं थी और सभी को घर जाना जरुरी था।
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपइया- वर्मतान में ऐसा वर्ग भी है जिसे यह पता नहीं कि अठन्नी है क्या या किसी ने को ही 12-17 साल वाले को पता हो कि बारह आन्ने किसे कहते हैं लेकिन शायद कभी पुरानी चल रही फिल्मों के बीच टीवी पर आमदनी अठन्नी खर्चा रुपइया वाला टाइटल चलता या डायलोग सुना हो ? हाल में यही सब उन लोगों के साथ भी हुआ है जो घर के बाहर रोजी-रोटी के लिए आए हुए थे. महामारी की मार ऐसे लोगों पर भी भारी पड़ी है. लेकिन जख्म पर मर्हम तब कोई लगाता जब कोई जानने वाला इस घाव के बिना रहा हो. हर कोई इस महामारी का शिकार हुआ है बेशक रोगी क्वारटाइंन हैं लेकिन असल में मरीजों की संख्या कहीं ज्यादा है जो समाज में रह रहे हैं. जिसकी दवाई अपनों के सिबाय शायद ही किसी के पास हो. उस मानसिक पीड़ा से न जाने कितने लोग झूझ रहे होंगे. क्योंकि महामारी के बीच लोगों की आय के साधन कम थे और खर्चे कम हुए लेकिन कईयों के वहीं पर खड़े थे जो पहले थे.
ऐसे में कुछ दिन परिवहन सेवा भी बंद रही. ऐसे में जिसको घर जाने की जो सुविधा मिली वह उस हिसाब से बिना बचत खाते का हिसाब किताब देखे घर की तरफ रुख करने लगा. इस श्रेणी में 20-30 आयु के लोग काफी देखे गए. लेकिन घर में जैसे भी रहे सबके अदंर सब्र रहा लेकिन अब सब्र का बांध टूटने लगा है क्योंकि महामारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही और जो बैलेंस या उधार लिया था वह भी शुन्य से नीचे के स्तर पर है यह ज्यादातर मध्यम वर्ग के लिए चिंता का विषय है क्योंकि घर की शेयर मार्केट धड़ाम से गिरी है और आय के साधन भी सृजित नहीं हो रहे . ऐसे में हर कोई मानसिक परेशानी का शिकार इस महामारी के बीच हो रहा है.
जिसकी लाट्ठी उसकी भैंस- सही है क्योंकि सरकार यही हो भी रहा है. महामारी के बीच भी यही स्थिति अधिकांश बनी. सरकार ने करोना महामारी के बीच जो भी आदेश दिए निर्देश दिए इसमें कोई सवाल नहीं की जनविरोधी थे लेकिन कहीं न कहीं दबे मन से कई सवाल उठे तो सही लेकिन हल्क से बाहर न पाए क्योंकि सन्नाटा हर तरफ पसरा हुआ था. जनता कर्फ्यू वाले दिन से ही खूब नियमों की धज्जियां उड़ाई गई जिसको जैसा सही लगा उसने वैसा किया. सोशल डिस्टेंसिंग का नियम सही मायने में कितना माना गया यह कैमरे पर सही और सच ही दिखा. पर कई राज्यों द्वारा एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए जो नियम बनाए गए वो कई हद तक सही थे लेकिन बाहरी राज्यों से लाए गए लोगों को सीधा गृह प्रवेश भी कहीं न कहीं महामारी को बढ़ावा देने वाला कदम साबित हुए ऐसे में अगर बाहरी सूबों से या क्षेत्रों से आए लोगों को सीध क्ववारटाइन सैंटरों में ही रखा जाता जो कदम बाद में उठाया गया तब मरीजों की संख्या
में इतना इजाफा न होने को मिलता . हाल ही में हुई पीएम से मुख्यमंत्रियों की वार्ता में पंजाब सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ही खूब पीठ थपथपाई गई और अखबारों की खबर भी सुर्खी रही कि पंजाब सीएम की तरह करोना संक्रमण को रोकने के लिए काम बाकि राज्यों में भी किया जाना चाहिए. लेकिन भाजपा सरकार वाले राज्य में जब आंकड़ा 1-2 पर आ पहुंचा था फिर चूक हिमाचल प्रदेश में कहां और कैसे हुई यह भी काफी सवाल खड़े करती है जो अब वर्तमान में करोना संक्रमितों की संख्या में वृद्धि हुई है. सीएम जयराम ठाकुर करोना को रोकने के लिए बहुत प्रयासरत हैं और केंद्र के दिशा-निर्देशों का भी खूब पालन कर रहे हैं . बाहरी राज्यों से हो रही आवाजाही के लिए अब नियम भी नए लागू हो गए हैं. लेकिन सीएम साहब वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए आने वाले दिनों में होने वाले पंचायती चुनावों के लिए भी कहीं न कहीं कमर कस कमान खींच रहे हैं ताकि भाजपा को अच्छा रिज्टल मिल सके. वैसे बीते 19 जून को राज्यसभा
चुनाव के लिए वोटिंग हुई। इसके बाद बीजेपी के विधायक और उनकी पत्नी में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई। इसके बाद कई विधायकों ने या तो खुद को क्वारंटाइन कर लिया है या फिर कोरोना जांच करवाई है। मतदान में 206 विधायकों ने भाग लिया था। इनमें एक कांग्रेस विधायक भी शामिल थे, जो कोरोना पॉजिटिव हैं। वे पीपीई किट में मतदान के लिए आए थे। बता दें कि मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीनों सीटों के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। भाजपा प्रत्याशी ज्योतिरादित्य सिंधिया को 56 और सुमेर सिंह सोलंकी को 55 वोट मिले हैं। वहीं, कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह को 57 और फूल सिंह बरैया को 36 वोट मिले हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर राज्यसभा पहुंचेंगे। भाजपा को दो वोटों का नुकसान हुआ है। कांग्रेस के लिए कहीं न कहीं करोनो के बीच और मध्यप्रदेश में मार्च में हुई उठापटक के बाद ये जश्न का माहौल था. लेकिन सरकार के लिए भी अबके वित्त वर्ष की शुरुआत कुछ सही
नहीं रही. सरकार ने अपनी आय के साधन बढ़ाने के लिए शराब के ठेकों को कई राज्यों में पहल दी . क्योंकि कांग्रेस शासित राज्यों के सीएम महामारी के बीच यह भी कह रहे थे कि केंद्र से कोई मदद नहीं मिल पा रही है और सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है. यह भी कहा जा रहा था कि आर्थिक स्थिति कायम रखने के लिए शराब की बिक्री जरुरी है. इसी बीच कांग्रेस और भाजपा एकमत होती दिखी लेकिन यह बात भी सच्ची है कि भाजपा शासित राज्यों के सीएम हाईकमान तक अंदर खाते आर्थिक स्थिति से बाकिफ करवाते रहे जोकि कांग्रेस शासित राज्यों की सरकार के लिए आसान नहीं था. लेकिन समाजिक मामलों के माहिरों का यह भी मानना है कि शराब की बिक्री शुरु होने से जिस क्राइम रेट पर अंकुश लगा था वह ग्राफ अब धीरे-धीरे बढ़ने शुरु हो गया है. गृह कलह, झगड़े और लूटपाट के मामलों में क्राइम रेट फिर बढ़ने लगा है जहां बिक्री न होने से इन सब मामलों में रोक लगी हुई थी. साथ में कुछेक लोगों का यह भी
मानना है कि जब तक शराब के ठेके बंद थे तब तक लोग घऱ के अंदर शांति से थे - अब इससे घर की आर्थिक स्थिति कमजोर हो ही रही है साथ में लोकडाउन में ढील दिए जाने के बाद वीकेंड पर लोग पार्टियां भी करने लगे हैं. जिससे इसके करोना के संक्रमण का खतरा और बढ़ने का अंदेशा है .
"साइलेंट या वायलेंट " पिछले कई महीनों से भारत हीं नहीं दुनिया भर में सबने घर के बाहर मौन धारण किया हुआ था लेकिन अब साइलेंट जोन धीरे-धीरे फिर वायलेंट होने की तरफ बढ़ रही है. पिछले दिनों किसी के प्रति किसी ने किसी भी प्रकार का प्रोटेस्ट नहीं किया. यहां तक की कुछ लोगों का रोजगार भी चला गया फिर भी शांतिमय तरीके से सबने हर मसला हल करने की कौशिश की थी. किसी को मासिक तय वेतन से कम तनख्बाह भी मिली उसमें भी संबंधित व्यक्ति ने गुजारा किया. लेकिन अब जैसे-जैसे स्थिति पटरी पर आने लगी है सरकार के विरोध में नारेबाजी शुरु हो गई है. पंजाब में किसानों के साथ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, लोक इंसाफ पार्टी मिलकर केंद्र के विरोध में मोर्चा खोले हुए हैं क्योंकि इनकी तरफ से कहा जाता है कि केंद्र की भाजपा सरकार की तरफ से जो आर्डिनेंस लाया गया है जो एम एस पी के संबंध में मोदी सरकार ने फैसला किया है वह किसान विरोधी है. साथ ही लगातर बढ़ रही पैट्रोल-डीजल की कीमतों
के विरोध में भी केंद्र के खिलाफ नारेबाजी शुरु हो रही है. ऐसे में केंद्र की भाजपा सरकार के लिए आने वाले दिनों में बड़े जन आंदोलन का सामना भी करना पड़ सकता है, साफ तौर पर कहा जाए की पैट्रोल - डीजल की कीमतें बढ़ने से अब मंहगाई भी बढ़ने के आसार नजर आने लगे हैं. परिवहन सेवा के जरिए हो रहे आयात-निर्यात पर सीधे तौर पर खाने-पीने और अन्य जरुरी वस्तुओं पर भी इन बढ़ती कीमतों का असर पढ़ेगा. इतना ही नहीं उद्योगों की स्थिति सही न होने के चलते काफी लोगों को भी बेरोजगार होना पड़ा है ऐसे में आने वाले दिन उद्योगपतियों के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं. क्योंकि उन्हें भी हर तरह की मुसीबत के साथ कर्मचारियों के विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है. सरकार की तरफ से गरीब तबके के लिए कुछ सुविधाएं भी दी गई हैं साथ ही मनरेगा के तहत काम करने वालों के खाते में राशि भी भेजी गई है पर नौकरी गबा चुके लोग अब नयी जगह छानबीन कर जानकारों से संपर्क साध रहे हैं. क्योंकि अब अंदेशा मंहगाई होने का है और साइलेंट जनता वायलेंट होने की राह पर .
के विरोध में भी केंद्र के खिलाफ नारेबाजी शुरु हो रही है. ऐसे में केंद्र की भाजपा सरकार के लिए आने वाले दिनों में बड़े जन आंदोलन का सामना भी करना पड़ सकता है, साफ तौर पर कहा जाए की पैट्रोल - डीजल की कीमतें बढ़ने से अब मंहगाई भी बढ़ने के आसार नजर आने लगे हैं. परिवहन सेवा के जरिए हो रहे आयात-निर्यात पर सीधे तौर पर खाने-पीने और अन्य जरुरी वस्तुओं पर भी इन बढ़ती कीमतों का असर पढ़ेगा. इतना ही नहीं उद्योगों की स्थिति सही न होने के चलते काफी लोगों को भी बेरोजगार होना पड़ा है ऐसे में आने वाले दिन उद्योगपतियों के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं. क्योंकि उन्हें भी हर तरह की मुसीबत के साथ कर्मचारियों के विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है. सरकार की तरफ से गरीब तबके के लिए कुछ सुविधाएं भी दी गई हैं साथ ही मनरेगा के तहत काम करने वालों के खाते में राशि भी भेजी गई है पर नौकरी गबा चुके लोग अब नयी जगह छानबीन कर जानकारों से संपर्क साध रहे हैं. क्योंकि अब अंदेशा मंहगाई होने का है और साइलेंट जनता वायलेंट होने की राह पर .

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